मन कहता है शश्त्र उठा लूं
चीर दूं सीना हैवानो का
जो मैला करते हैं तन को
कहते हैं की भूल हो गयी
खबर नहीं है इस मिटटी की
शत्रु की नजरें तनी हुयी
कुत्सित मन के ब्यभिचारों से
व्यथा आज फिर घृणित हुयी
कांधे पर संगीन नहीं है
नजरों में कायरता है
बना हुआ है व्याध निरंकुश
बचपन को अब रौंद रहा
मन कहता है दावानल बन
अग्नि प्रवाहित लहरों से
एक धधक सब ख़ाक मिला दूं
ज्वलित अस्त्र आवाहन मन
चीर दूं सीना हैवानो का
जो मैला करते हैं तन को
कहते हैं की भूल हो गयी
खबर नहीं है इस मिटटी की
शत्रु की नजरें तनी हुयी
कुत्सित मन के ब्यभिचारों से
व्यथा आज फिर घृणित हुयी
कांधे पर संगीन नहीं है
नजरों में कायरता है
बना हुआ है व्याध निरंकुश
बचपन को अब रौंद रहा
मन कहता है दावानल बन
अग्नि प्रवाहित लहरों से
एक धधक सब ख़ाक मिला दूं
ज्वलित अस्त्र आवाहन मन


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